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Wednesday, 22 January 2020

मिलिए शहर के लिटिल ‘एनवायर्नमेंट एवेंजर’ श्रेष्ठ मंगल से

इस छोटे से बच्चे का कहना है कि हमारे पर्यावरण को बचाने बाहर से कोई नहीं आएगा, हमें ही बनना होगा ‘एनवायर्नमेंट एवेंजर’
जयपुर।  शहर के लिटिल ‘एनवायर्नमेंट एवेंजर’ श्रेष्ठ मंगल उम्र में कफी छोटे है, लेकिन काम काफी बड़ा कर रहे  है। छठवीं क्लास में पढऩे वाले मात्र ग्यारह साल के श्रेष्ठ अब तक छह सौ से ज्यादा पौधे लगा चुके हैं और इनमें से ज्यादातर पौधे ऐसे हैं जिन्हें श्रेष्ठ ने गुठली से तैयार किया है। वे अपने ‘ग्रीनिस्तान’ प्रोजेक्ट पर पिछले एक साल से काम कर रहे हैं, जिसके तहत हजारों पौधे लगाने का लक्ष्य है। श्रेष्ठ बताते हैं कि करीब दो साल पहले न्यूज पेपर में दिवाली के बाद के पॉल्यूशन के आंकड़े देख रहा था और इत्तेफाक से उस वक्त मैं अपना फेवरेट फ्रूट जामुन खा रहा था। मैं जैसे ही गुठली फेंकने लगा मेरे मन में खयाल आया कि इस गुठली से मैं एक पौधा तैयार कर सकता हूं, जो फ्यूचर में एक पेड़ की शक्ल लेगा और एनवायर्नमेंट को हैल्दी रखने में मदद करेगा। बस उस दिन से मैंने फ्रूट्स की गुठलियों से पौधे उगाने शुरू कर दिए।

आज ग्लोबल वार्मिंग से हर कोई जूझ रहा है। हमारे पर्यावरण को बचाने बाहर से कोई एवेंजर नहीं आएगा। हमें खुद ही नेचर को बचाने के लिए कदम बढ़ाने होंगे। मेरा मानना है कि आपका एक छोटा सा इनिशिएटिव सेव एनवायर्नमेंट की दिशा में बड़ा रिजल्ट दे सकता है। जब मैंने इस बारे में अपने पैरेंट्स को बताया तो उन्होंने मुझे काफी सपोर्ट किया तथा मेरे दादा श्री भगवान दास मंगल ने हमेशा मेरा मार्गदर्शन किया। मां हमेशा पौधे लगाने और इनकी देखभाल में मेरी हेल्प करती है। कुछ लोग कहते हैं कि एक अकेला बच्चा थोड़े से पौधे लगाकर क्या कर लेगा, उनको मेरा जवाब है कि दुनिया में ही नहीं इंडिया में भी ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अकेले जंगल खड़े कर दिए हैं। मेरे एनवायर्नमेंट लव को लेकर स्कूल में भी टीचर्स और फ्रेंड्स एप्रिशिएट करते हैं।

श्रेष्ठ ने शहर में एक क्रिकेट लीग के इनोग्रेशन के मौके पर करीब 250 प्लेयर्स को जामुन के पौधे गिफ्ट किए हैं। सबसे खास बात ये है कि ये सारे पौधे उन्होंने खुद गुठली को जमीन में बोकर तैयार किए हैं। श्रेष्ठ ने बताया कि वे स्टडी से टाइम निकालकर डेली पौधों को  टाइम देते हैं, ये उनकी लाइफ का हिस्सा है। इनके साथ टाइम बिताना मुझे अच्छा लगता है, ये मुझे समझने लगे हैं और मैं इन्हें। अपने फ्यूचर गोल के बारे में श्रेष्ठ का कहना है कि मैं मकैनिकल इंजीनियर बनकर इलेक्ट्रिक वीकल्स बनाना चाहता, जो पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मददगार साबित हो।

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