इन्हेलर से अस्थमा का इलाज बेहतर : डॉ मान - Pinkcity News

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Tuesday, 7 May 2019

इन्हेलर से अस्थमा का इलाज बेहतर : डॉ मान

  • महात्मा गांधी अस्पताल में विष्व अस्थमा दिवस मनाया

जयपुर। अस्थमा ष्वसन तंत्र की एक गंभीर बीमारी है। वातावरणीय बदलाव, जैनेटिक तथा एलर्जिक कारणों से अस्थमा पीड़ित रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। विष्व भर में 300 मिलीयन व्यक्ति अस्थमा से पीड़ित है तथा 2025 तक यह संख्या बढ़कर 400 मिलियन होने की संभावना है। भारतवर्ष में 15 से 20 मिलीयन व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है जो कि कुल जनसंख्या का 2 से 3 प्रतिषत है। महात्मा गांधी अस्पताल के अस्थमा एवं ष्वास रोग विषेषज्ञ डॉ. लोकेष मान ने इस वर्ष की थीम स्टोप फॉर अस्थमा विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने बताया कि  अस्थमा कि वजह से प्रतिवर्ष 2.5 लाख व्यक्ति आकस्मिक मृत्यु के षिकार हो जाते हैं। अगर सही समय पर सही उपचार लिया जाए तो इनकी जान बचाई जा सकती है। उन्होंने इस वर्ष की थीम को परिभाषित करते हुए कहा कि एस फॉर लक्षण मुल्यांकन, टी फॉर परिक्षण प्रतिक्रिया, ओ फॉर निरीक्षण एवं मूल्यांकन, पी फॉर बढना और समायोजित इलाज को विस्तार से परिभाषित किया।
अस्थमा रोगी के षुरूआती लक्षण जैसे-खांसी आना, ष्वांस लेने मे परेषानी, छाती में भारीपन, ष्वांस में आवाज आना आदि होते है। जब मरीज देरी से अस्थमा एवं ष्वास रोग विषेषज्ञ के पास जाता है या इलाज में लापहरवाही करता है तो यह स्थिति रोगी के लिए अधिक गंभीर हो जाती है। साथ ही रोगी के ष्वांस में रूकावट बढ़ जाती है रोगी कि इस स्थिति को ’’अस्थमा अटैक’’ कहते है।
चिकित्सा विज्ञान के विकास की वजह से अस्थमा लाइलाज नहीं रहा है। डॉ़ मान ने बताया कि इसके लिए इन्हेलर के रूप में बहुत ही कारगर इलाज उपलब्ध है। हमारे भारतवर्ष के ग्रामीण क्षेत्रों में इन्हेलर के बारे मे बहुत सारी गलत धारणायें है। जिसके कारण मरीज इन प्रभावषाली दवाइयों को लेने से डरता है जबकि इन्हेलर के रूप में उपलब्ध दवाऐं सबसे ज्यादा असरदार होती है। इनके साइड इफेक्ट भी नहीं के बराबर होते हैं। इन्हेलर को डॉक्टर की सलाह के बिना षुरू और बंद नहीं करना चाहिए। अस्थमा के मरीज को लम्बा इलाज लेना पड़ता है तथा जॉच के बाद ही इसकी मात्रा को कम या ज्यादा किया जाता है। कई बार मौसम परिवर्तन के कारण अस्थमा के दौरे बढ़ जाते है। ये एलर्जी के कारकों को का वातावरण मे बढ़ जाने से होता है। इन एलर्जी के कारणो का स्किन प्रिक टेस्ट से पता लगाया जा सकता है।

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