गायत्री शक्तिपीठ में आवासीय प्रशिक्षण शिविर - Pinkcity News

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Saturday, 11 May 2019

गायत्री शक्तिपीठ में आवासीय प्रशिक्षण शिविर

जयपुर। अखिल विश्व गायत्री परिवार की युवा इकाई डिवाइन इंडिया यूथ एसोसिएशन(दीया) की ओर से ब्रह्मपुरी स्थित गायत्री शक्तिपीठ में किशोर वर्ग  के  आवासीय प्रशिक्षण शिविर उत्कर्ष में दूसरे दिन शनिवार को 30 बच्चों को अनेक प्रशिक्षकों ने जीवन जीने के शानदार सूत्र दिए। शिविर में कक्षा आठ से दस तक 30 बच्चे भाग ले रहे हैं। सुबह साढ़े चार बजे जागरण से लेकर रात्रि दस बजे तक बच्चों को विभिन्न गतिविधियों के   माध्यम से देश का जिम्मेदार नागरिक बनने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सुबह योगाचार्य रामेश्वर और कीर्ति ने बच्चों को योगाभ्यास करवाया। इसके अन्तर्गत प्रज्ञायोग सहित अनेक योगासनों से होने वाले लाभ की जानकारी दी। ध्यान का अभ्यास कर बच्चों ने गायत्री यज्ञ में आहुतियां अर्पित कीं। यज्ञ का संचालन भी बच्चों ने किया। बौद्धिक सत्र में भक्तभूषण वर्मा, नीलम वर्मा, पृथ्वीनाथ, राजकुमार सातांकर, प्रेमा राठौड़, पायल सिंघल, प्रखर सक्सेना, प्रीयांशु वर्मा, सौरव अग्रवाल, ओमप्रकाश जांगिड़, दीक्षा ने बच्चों को प्रेरणादायी कहानियों और महापुरुषों के दृष्टांत के माध्यम से जीवन जीने के सूत्र दिए।
चंदा देवी ने कहा कि अच्छे काम करने के लिए मेहनत बहुत जरुरी है। इसलिए संघर्ष से घबराना नहीं चाहिए। व्यक्तित्व को गिराने के लिए एक बुराई ही काफी है। पायल सिंघल ने क्यों पढ़े-क्या पढ़े और कैसे पढ़े पर विषय पर गतिविधि आधारित क्लास ली। योगाचार्य रामेश्वर ने सात्विक भोजन पर उद्बोधन देते हुए कहा कि हम जैसा अन्न खाएंगे वैसा ही हमारा मन और जीवन बनेगा। बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाई की ललक जगाने के लिए अनेक गतिविधि आधारित क्रियाएं करवाई।
 शिविर संयोजक भक्तभूषण वर्मा ने कहा कि वर्तमान समय सभी के लिए चुनौतीपूर्ण है। अथक परिश्रम और  पुरुषार्थ के बाद भी संतोष और खुशी के पल यदा-कदा ही देखने को मिलते हैं।  ऐसे में घर-परिवार का वातावरण सौहाद्र्रपूर्ण रखना एक चुनौती  है। इसी आपाधापी में बच्चों के लिए समय न निकाल पाने के कारण उनके पास समय गुजारने के साधन के रूप में मोबाईल, टीवी, लेपटॉप के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रह जाता।  इन सबके कारण बच्चों का जीवन, मूल्यों से परे दिखाई देने लगा है। साथ-साथ खाना, खेलना, सीखना, पढऩा, चर्चा करना आदि का अभ्यास न होने के कारण बाद में जाकर यही एकाकी जीवन नीरस और बोझिल लगने लगता है। उत्कर्ष श्ििावर के माध्यम से  यह प्रयास किया गया है कि भावी पीढ़ी उन गुणों का अभ्यास कर सके जो जीवन जीने की कला के रूप में जाने जाते हैं ।
यह भी सिखाया जा रहा है शिविर में:                                                           
  • व्यसन और कुरीतियों से दूर रहकर खुशी और आनंद का अभ्यास करवाना।
  • मिलजुल कर सहकारिता से खेल-खेल में सीखने  की ललक जगाना। 
  • अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्य को अधिक महत्व देने की सीख देना।
  • भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्वों रामायण, गीता, यज्ञ, महाभारत के दर्शन से
    परिचित  करवाना।
  •  हताशा, निराशा, तनाव से दूर एवं आनंद और उल्लास के  सामीप्य की अनुभूति करवाना।

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