कथक के ओरिजन को लेकर नृत्यगुरुओं के अलग-अलग मत - Pinkcity News

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Saturday, 20 April 2019

कथक के ओरिजन को लेकर नृत्यगुरुओं के अलग-अलग मत

जयपुर, 20 अप्रेल।  थिरक इंडिया कल्चरल सोसासटी की ओर से जवाहर कला केन्द्र में चल रहे दो दिवसीय थिरक उत्सव  के आखिरी दिन शनिवार को रुट्स ऑफ कथक विषयक संगोष्ठी हुई। इसमें देश-दुनिया के मशहूर कथक कलाकारों ने कथक के असल उद्भव स्थल पर विचार रखे। कथक के ओरिजन को लेकर नृत्यगुरुओं के अलग-अलग मत सामने आए। पैनेलिस्ट चर्चा में कथक के आला फनकारों ने इस बात पर बल दिया गया कि भारत में कथक नृत्य की समृद्धशाली परंपरा रही है।
इन्होंने लिया हिस्सा
संगोष्ठी में नई दिल्ली से जयकिशन महाराज, मुम्बई से सुनयना हजारीलाल, सिंगापुर से पं.चरण गिरधर चांद, नई दिल्ली से बृजेन्द्र रेही, नवीना जाफा, जयपुर से ज्योति भारती गोस्वामी,मंडला से चेतना ज्योतिषी, नई दिल्ली से जयंत कस्तूर, नई दिल्ली से मंजरी सिन्हा, लखनऊ से पूर्णिमा पांडे, पुणे से रोशन दातये शामिल हुईं। नई दिल्ली की प्रेरणा श्रीमाली ने संगोष्ठी को मॉडरेट किया।
कथक के ओरिजन लेकर विवाद-पूर्णिमा पांडे
लखनऊ की पूर्णिमा पांडे ने कहा कि कथक विशाल वृक्ष की तरह है। कथक के ओरिजन  को लेकर फिलहाल  विवाद जरूर बना हुआ है। जयपुर घराना, लखनऊ घराना आदि कहते हैं कि कथक की असल शुरुआत उन्हीं की जमीं से हुई। यह कहने के लिए उनके पास ठोस सबूत भी है, लेकिन कथक का वृक्ष एक है और उसकी शाखाएं बहुत जगहों पर फैली हुई है। उन्होंने कहा कि स्पेन में किया जाना वाला फ्लैमिंको नृत्य कथक शैली की तरह है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कथक की रुट्स कहां है। यह मंथन का विषय बना हुआ है। उन्होंने कहा कि कथक को नाम को लेकर भी नृत्य गुरुओं के अलग-अलग मत हैं। पं.शंभु महाराज इसे कथक नहीं नटवरी कहते थे। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद कथक को समाज में प्रतिष्ठा मिली। इससे पहले इसे पतोरिया यानी तवायफों का काम कहा जाता था, लेकिन जहां तक तहजीब का सवाल आता है तो तवायफों के पास प्रतिष्ठित परिवार के लोग भी गुरेज नहीं करते थे।
मूर्तियां में  कथक का अक्स-रोशन दातये
पुणे की कथक नृत्य गुरु रोशन दातये ने कहा कि कथक नृत्य और मूर्तिकला में तादात्म्य भाव परिलक्षित होता है। यही कारण 5वीं शताब्दी की नृत्य मुद्रा की मूर्तियों में कथक के अंग संचालन को परिभाषित करते हैं। भरतमुनि ने भी हाथ और पैरों की 108 क्रियाएं बताई हैं। उन्होंने बताया कि नाट्यशास्त्र से नृत्य शैलियों का उद्भव हुआ है।
आज कथक साहित्य से दूर है -जयंत कस्तूर
नई दिल्ली के जयंत कस्तूर ने कहा कि आज कथक नाच अपना मूल स्वरूप खो रहा है। इसकी खास वजह कथक के समृद्ध साहित्य से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने भक्ति और शृंगार भाव के आधार पर कथक को व्याख्यायित किया। उन्होंने  कहा कि कथक नाच के लिए संगीत और साहित्य दोनों बेहद जरूरी है। संगीत से सुर और ताल मिलते हैं। वहीं साहित्य से भक्ति और शृंगार भाव मिलते हैं। जबकि अधिकतर लोग कथक को हिन्दुस्तानी नृत्य समझते हैं।
लोक संस्कृति में दिखती हैं कथक की झलकियां-डॉ. ज्योति भारती
फिल्मकार बृजेन्द्र रेही ने कहा कि मंदिरों में कथक के लालित्य का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।  इसी आधार  पर कहे सकते हैं कि कथक हमारी गौरवशाली समृद्ध परंपरा रही है। इसलिए इसकी जड़ें भी भारत में ही है। सिंगापुर के पं.चरण गिरधर चांद ने कहा कि कथक  के तकनीकी, भाव पक्ष और सौन्दर्य शास्त्र पर  रोशनी डाली। उन्होंने बताया उनकी 9 पीढिय़ों से कथक की जड़ों का सींचा जा रहा है। मुम्बई की सुनयना हजारीलाल ने कहा कि उनके गुरु जानकीप्रसाद बीकानेर के रहने वाले थे, लेकिन उन्होंन  बनारस में इसे स्थापित किया जो बनारस घराना कहलाया। इसलिए कथक की जड़ें बीकानेर से भी जुड़ती हैं। नवीना जाफा ने कहा कि कथक की झलकियां लोक संस्कृति में देखी जा सकती है। जयपुर की कथक नृत्यांगना  डॉ. ज्योति भारती गोस्वामी ने कहा कि राजपूत समाज में भी कथक देखने को मिलता है। कथक  सम्राट पं.बिरजू महाराज के बेटे जयकिशन महाराज ने कहा उनके यहां नौ पीढिय़ों से कथक हो रहा है। उन्होंने कथक में अंग संचालन मं पंचगुण की प्रमुखता बताई। आखिर में थिरक इंडिया कल्चरल सोसासटी की सचिव मनीषा गुलयानी ने सभी आगन्तुकों का आभार जताया।


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