काम, क्रोध और लोभ नरक के प्रवेशद्वार : -स्वामी अद्वयानन्द - Pinkcity News

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Thursday, 28 March 2019

काम, क्रोध और लोभ नरक के प्रवेशद्वार : -स्वामी अद्वयानन्द

जयपुर, 28 मार्च, 2019। चिन्मय मिशन द्वारा मालवीय नगर स्थित पाथेय भवन के देवऋषि नारद सभागृह में गीता जी के 16वें अध्याय पर प्रवचन  करते हुए स्वामी अद्वयानन्द जी ने बताया कि काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं. ये तीनों आध्यात्मिक प्रगति के सबसे बड़े बाधक हैं। शास्त्रों के नियमित अध्ययन तथा सत्संग की सहायता से हमें इन तीनों को अपने व्यक्तित्त्व से पूरी तरह दूर रखना चाहिए.  उन्होंने कहा बाह्य जगत की वस्तुएं क्षणिक सुख तो दे सकती हैं पर परिपूर्णता का अनुभव कभी नहीं करा सकतीं. अपने आत्मबोध का अनुभव न केवल परिपूर्णता का अनुभव कराता हैं बल्कि असीम आनंद की अनुभूति भी देता है. उन्होंने आगे कहा कि मनुष्य योनि बहुत दुर्लभ है और इसी योनि में आध्यात्मिक प्रगति अथवा दुर्गति संभव है. इसलिए हमें सदैव प्रगति की ओर बढ़ना चाहिए। 
काम से लोभ बढ़ाता हैं काम के पूरा होने में व्यवधान से क्रोध बढ़ाता हैं इसी श्रंखला में बाकि सब आसुरी प्रवृति विकसित होती हैं। 
मात्र कामनाओं को संयमित करने से इस श्रंखला को समाप्त किया जा सकता हैं किन्तु काम को पहचानना मुश्किल होता हैं वहीं इसके लक्षण क्रोध व लोभ बढ़ने से प्रत्यक्ष रूप से  प्रगट होते हैं तब इन्हे रोकना आवश्यक हैं इसीलिए भगवान कृष्ण ने काम क्रोध व लोभ तीनों को संयमित करने का अभ्यास करने की प्रेरणा दी हैं। 

क्रोध व लोभ का इस्तेमाल संयमित रूप में किया जाना चाहिए असंयमित वृतियों को भगवान पर प्रयोग करने से ये दानवी प्रवृतियां भी शुद्ध हो जाती हैं। 

इससे पूर्व प्रातः 8 से 9 बजे तक अद्वैत पञ्चरत्नं पर प्रवचन करते हुए स्वामी जी ने बताया कि मेरा वास्तविक स्वरुप  तो साक्षी, नित्य और प्रत्यगात्मा (अंतरात्मा) का है जिसे हम चेतन भी कहते हैं.. साक्षी वह है जो दृश्य का दृष्टा है परन्तु दृश्य का  उस पर कोई प्रभाव नहीं है, न ही वह दृश्य की किसी क्रिया में पात्र है. नित्य वह है जो अनन्त अविनाशी है. नित्य समय (काल)  का भी साक्षी है. दो घटनाओं के बीच के अंतर को समय माना जाता है. घड़ी से तो हम केवल समय की गणना करते हैं. वह चेतन मैं स्वयं हूँ वही मेरा वास्तविक स्वरुप है.शरीर, इन्द्रियां, प्राण, मन बुद्धि और अहंकार तो  अनित्य और परिछिन्न हैं. अहंकार भी आता जाता  रहता है. चेतन ही पूरे जगत का अधिष्ठान है। स्वामी जी के गीता पर प्रवचन प्रतिदिन साँय 6.30 बजे से 8 बजे तक तथा पञ्चरत्नं पर प्रातः 8 से 9 बजे तक 31 मार्च  तक होंगे। 

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