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Tuesday, 26 March 2019

अपने सत-चित-आनन्द स्वरुप को जान लेना ही अद्वैत है”

जयपुर।  चिन्मय मिशन द्वारा मालवीय नगर स्थित पाथेय भवन के देवऋषि नारद सभागृह में गीता जी के 16वें अध्याय पर प्रवचन  करते हुए स्वामी अद्वयानन्द जी ने पहले 3 श्लोकों में वर्णित 26 दिव्य सद्गुणों (जीवन मूल्यों)  को विस्तार से समझाया. अभय, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान हेतु योग में दृढ़ता दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, कर्तव्य पालन हेतु कष्ट सहना, शरीर मन और वाणी की सरलता , अहिंसा, सत्य भाषण , क्रोध नहीं करना, सांसारिक कामनाओं का त्याग, चित्त में राग-द्वेष की न्यूनता, चुगली न करना, प्राणियों पर दया, सांसारिक विषयों में न ललचाना, चित्त की कोमलता, अकर्तव्य करने में संकोच, चपलता की कमी, प्रभावशीलता, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, दुश्मनी का भाव न रखना तथा सम्मान की इच्छा न रखना इत्यादि सद्गुण हमें अपने अंदर विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। 
ये सद्गुण  आध्यात्मिक सफलता के लिए तो जरूरी है ही लेकिन बाकी सांसारिक सफलता के लिए भी आवश्यक है स्वामी जी ने हमारी आध्यात्मिक उन्नति मे तीव्रता व सरलता लाने के लिए सभी साधक को गृह कार्य दिया की इन 26 मूल्यों मे से अपनी पसंद के 5 अथवा 10 मूल्यों का चयन कर उनका पूर्ण मनोयोग से प्रति दिन अनुसरण करें। 
इससे पूर्व आज से प्रातः 8 से 9 बजे तक आदि शंकराचार्य कृत अद्वैत पञ्चरत्नं नामक प्रकरण ग्रन्थ पर भी स्वामी जी के प्रवचन आरम्भ हुए। ग्रन्थ के शीर्षक - अद्वैत पञ्चरत्नं से परिचय कराते हुए स्वामी जी ने बताया कि मैं ही सत-चित-आनन्द स्वरुप ब्रह्म हूँ - यह जान लेना ही अद्वैत है. क्योंकि इस शास्त्र में पांच श्लोक हैं इसलिए पञ्च शब्द का प्रयोग हुआ. यह ज्ञान अत्याधिक सुन्दर है, दुर्लभ है तथा अत्याधिक कीमती है इसलिए रत्न शब्द का  प्रयोग हुआ।   स्वामी जी के गीता पर प्रवचन प्रतिदिन साँय 6.30 बजे से 8 बजे तक तथा पञ्चरत्नं पर प्रातः 8 से 9 बजे तक 31 तक होंगे। 

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